Thursday, February 16, 2012

Bhagwaan...

Kisee ne bataya tha, tum ek kadam 
bhagwaan ki taraf loge to wo sau 
kadam tumhari taraf lega...
Buss waheen par sara ganit gadbadaa gayaa,
maine uski taraf ek kadam liya to usne meri
taraf sau liye aur ek kadam aage nikal gayaa...
maine palat kar phir ek kadam liya to wo 99
kadam udhar ko nikal liya !
tabse dono lage hue hain...

Harsh...

Thursday, February 9, 2012

14th Feb, Valentine Day Diary

10 AM..just send an sms to Josephine from work,no need for anything more,been actin too 'touch me not' for too long. 
12 AM... Liz wakes up by then...,mmm..call her for a two minute pc..just met not sure abt her,got to tke it easy for a bit.
Oh..11.30AM...call Rita in her cigarette break..damn, how could i forget this one?..she seems intresting n even intrested.. ;-)
1.30PM.. Shilpa's agreed for lunch...yay!..will warm her up for a Dinner night someday... ;-)
6PM...leave early from work...a quick coffee with Natasha, she is cool but has her 'limits' set for now, no need to waste much time over her this evening finish with her fast and by
8PM a quick meet up with Rainaa, at her place, it will be about ten minutes..she is alone till 8.30 but looking forward,she is fun.. ;-), alas cant be with her for the whole evening, she will have to be with her husband...
9.30PM..mmm..this is gonna be a date of the night.. ;-) ...Karen..she is wild and goes all out...whoopeee!
...mmmm..am i forgetting someone?..or something?...i think i am..shit..what is it?...aah Wifeyy ! oh no..now where do i fit her in...shit!..now?...oh ya, i know what..get a ring or something...get home late in the night looking really 'tired after all days hard work',gift her the ring..go to sleep...day taken care of... ;-)


harsh

Wednesday, January 18, 2012

"थंब्स अप" बनी औकात...

बस अभि ’बम्बई’ आया हि था...
एक दो साल हुए होंगे ।
छोटा मोटा कोई काम मिल जाता, बस चल पड़ते और घर से निकल शूटिग तक पहुँचते कुछ ऐसी अटकले लगतीं और उस छोटे से काम के बहाने इतनी दूर तक दिमाग़ चलता, कि बस आज ये काम एक बार कोई देख ले फिर दुनिया को बताता हुँ...शूटिंग तक पहुँचते अपने आप को किसी बड़े हीरो से कम न पाता। फिर अपना काम कर घर लौट आता...इससे ज़्यादा कुछ न होता ! और ये सिलसिला चलता रहा...
एक दिन ये भि आया कि एक बड़े और बहुत नामी प्रोडक्शन ऑफ़िस से एक फ़ोन आया, किसी भले आदमी ने मेरा काम देख मेरे नाम कि सिफ़ारिश की थी सो मुझे बुलाया गया था। कुछ एक सीन दिये गये, अपनी समझ से जो बन पड़ा वो किया और चला आया। कुछ दिनों बाद पता चला उस वक़्त के एक बड़े कहे जाने वाले सीरीयल में मुझे एक अहम भूमिका का पात्र मिला । बस अब तो यह हाल कि उन दिनों का सबसे बड़ा हीरो नहीं या मैं नहीं !
पहले दिन शूटिंग पर पहुँचा, दस घन्टे बैठा और मेरा काम न शुरु हुआ। लौट के बुध्धू घर को आये...लेकिन ऐसी भि कोई आफ़त नहीं थी पहला हि दिन था कल भि तो सूरज उगने वाला था सो कल भि साबित करने का मौका मिलने वाला था । सूरज तो बेशक उगा और मैं फिर ”दुनिया कि ऐसी कि तैसी ”  करने निकला और एक बार फिर दस घन्टे बैठा और मेरा काम न शुरु हुआ, और यूँ कुछ सात दिन बीते...कुछ ऐसा आभास कि बस आम तौर पर तभी होता है जब आप बहुत सारा पानी पी लें और फिर घन्टों आपको कोई शौचालय न मिले !
आठवें दिन मुझसे कहा गया, ”आप सेट पर आ जायें, आपके सीन कि तैयारी चल रही है"...अमूमन जब तक आपका काम नहीं होता आपसे यही उम्मीद रखी जाती है कि आप अपने मेक अप रूम में बैठे रहें सो सात दिन बाद वहाँ से निकलने का मौका हाथ लगा और बदन में एक गज़ब कि स्फूर्ती आ गयी कि कोई पकड़े रखे वरना उड़ जाउँगा । और उड़्कर नीचे सेट पर पहुँचा...आपके सीन कि तैयारी का मतलब हुआ कि अभी एक घन्टा और है, सीन कि ’लाईतिंग’ चल रही होती है...और तब तक आप दूसरे कलाकरों के साथ एक कोने में सीन कि ”रिहर्सल” करते हैं, लाईने पढी जाती हैं और हम जैसे आये नये बन्दों को विराम और अल्प विराम तक समझाया जाता है भले ही आप कितने ही पढे लिखे क्यूँ न हों, खैर काम का हिसा है सो झेलना ही हुआ।
शूटिंग पर ”स्पॉट बॉय" होते हैं उनका काम है लोगों को चाय पानी पिलाते रेहना, ऊपर मेक अप रूम में किसी को कहता तो दिन भर एक प्याली चाय का इंत्ज़ार कर, मैं घर जाकर ही चाय पीता । तब लगता कि ठीक भि है, अब नीचे इतने लोगों से फुर्सत मिले तब तो बेचारा ऊपर आये, अब जब नीचे सेट पर आया तो लगा शायद अब एक चाय कि प्याली घर पहुँचने से पहले मिल जायेगी। सो सोचा किसी से कहा जाये, किसी एक को रोक कर कहा..”सुनिये, ज़रा चाय पिला दें" , अब यह भि एक अजीब मान्सिक्ता है आम तौर पर उन्हॆ इतनी तमीज़ कि आदत नहीं सो उसने पूछा..”क्या मांगता है?" मैने सीधे सीधे कहा ”चाय ला दो"। उनकी ग़लती नहीं, सदियों से शायद उनकी यह आदत बन गयी है कि कोई ज़ोर से, लगभग चीख़ते हुए आवाज़ देता है .."स्पॉट ! "  और उन तीन चार में से कोई भी एक दौड़ा चला आता है फिर उसे आदतन फट्कारा जाता है कि ”अबे कब से बुला रहे हैं कहाँ है?!" वो अपना खिसियाना सा खड़ा रहता है फिर उसे आदेश दे भगा दिया जाता है.."अब जा भी, जा चाय लेकर आ, साले सोते रहते हैं! "..बस ऐंवईं...
कुछ देर हुई चाय आयी नहीं एक बन्दा फिर दिखा उस से कहा तो उसने भी कहा अभी लाया और मैं अपने काम में लग गया।
अल्प विराम और विराम कि क्लास में ध्यान देने लगा। गर्मी के दिन थे, हम में से एक वरिश्ठ और नामी कलाकार ने आवाज़ लगायी, "स्पॉट !! !" इज़्ज़ात के नाम पर एक बन्दा अपनी पीठ आधी झुकाये चला आया और इन्होंने उस से कहा.." ठंडा ला दो, कुछ भी" और वह सुन मुझे भी लगा ठंडा पिया जाये और मैंने उस से कहा ..”एक चाय बोली थी वह र्रहने दें, मुझे भि कुछ ठंडा ला दें " लेकिन साथ मैंने अपनी पसंद भि बतायी..”थंब्स अप हो तो ला दें", उस वक़्त तो उसने सबके बीच कहा,  ”है, लाता है" । तब तक वो वरिशठ महाशय भी रिहर्सल करते ऊब गये थे सो उन्होंने रिहर्सल बर्खास्त कर दी और हम सब का भी तख़लिया हो गया। अब सब अपना अपना कोना पकड़े सेट के तैयार होने का इंतज़ार करने लगे। दूर एक कोने में साहब का ठंडा आया और लौटते हुए वह बन्दा मेरे सामने से ऐसे गुज़रा जैसे कभी देखा ही नहीं, तब यह शक होने लगा कि शायद ऊपर भी इस ही मारे नहीं आता होगा कि "है कोई लौन्डा, बैठा रहे" । हर कोई यह जताने से नहीं चूकता कि आप नये आये हैं और आप जैसे कितने ही "टुच्चे" आये और गये, सो स्पॉट वाले भि क्यूँ पीछे रहे आखिर उनसे नीचे तो हम ही होते हैं,जो ”मुँह उठाये चले आते हैं, ’हीरो’ बनने" । ख़ैर , अब मैंने चुप रहना ही ठीक समझा और वह मेरे सामने से निकल लिया।
सीन तैयार हुआ और मुझसे पहले ही कह दिया गया था कि मुश्किल सीन है ज़रा रोना धोना होगा , सो मैं अपना ’मूड’ बनाये बैठा था, बनाना क्या था, उस मरी ’थंब्स अप” के किस्से ने यूँ तो मूड बना ही दिया था बस उस ज़िल्लत का रोना सीन में निकालना था ।
सीन शुरु हुआ, पहला ’टेक’ हुआ और किसी कारण बीच में रुक गया, सात दिन बाद आज मौका लगा था , बस अब दुनिया कि ऐसी कि तैसी करनी थी, लेकिन मेरा हिस्सा शुरु होने से पहले सीन फिर रुक गया...दोबारा शुरु हुआ...अब सबको यह तो मालूम था कि कोई नया ’लौन्डा” आया है सो सब मुझे ही जैसे अपने नज़रों के तीर मार रहे थे, तब ’स्पॉट’ वाले भि सीन के चलते वहीं खड़े रहते हैं फिर घर जाते शाम को आपस में तय करते हैं कि "अगले कि निकल पड़ी या नहीं" या फिर अगले को घर लौट जाना चाहिये या नहीं ।
सीन पूरा हुआ, महानुभावों कि उम्मीद से मैं अल्प विराम और विराम के सिखाये पाठ से कुछ ज़्यादा कर गया, यहाँ यह बता दूँ कि ख़ुद निर्देशक साहब को इतनी परेशानी नहीं थी कि मुझसे होगा या नहीं लेकिन उनके ”पिठ्ठू’ जो हम लोगों को "तैयार" करने के लिये लगाये होते हैं वह ज़्यादा फुदक रहे होते हैं, इनके लिये यहाँ एक कहावत है..”चाय से गरम केतली" ।
निर्देशक साह्ब उदार दिल थे, उन्होंने मेरे पहले सीन पर मुझे मुबारक बाद दी और कहा ”गुड", और पहली बार में सही से कर देने पर हलके से गले लगाया सो अलग, अब अगर हिन्दी फ़िल्मों के इतीहास में अब तक कि दो सबसे बड़ी फ़िल्मों कि मिसाल में से एक का निर्देशक आपके साथ ऐसा व्यवहार करे तो किसी कि आँख से यह चूकता नहीं।
मैं वापस अपनी कुर्सी पर जा बैठा जो किसी किनारे लगी थी, अचानक अब सारी आँखें जिस तरह मुझे देख रही थी ऐसे में मैने वो कोना पकड़ लेना ही ठीक समझा। और मेरे बैठने के बाद कुछ ही मिन्टों में वही ’स्पॉट” वाला मुस्कुराता हुआ हाथ में ”थंब्स अप" लिये खड़ा था । शायद मेरी निकल पड़ी थी । वह दिन और आज का दिन, लगभग बीस साल, अब पीछे देखो तो वो महज़ एक हादसा नज़र आता है जो हर किसी के साथ यहाँ घटता है, कोई बड़ी बात नहीं लेकिन उस दिन का असर कुछ यूँ हुआ मुझ पर कि,किसी भि शूटिंग पर अपनी ’थंब्स अप" अब मैं खुद ही खरीद के पी लेता हुँ...टंटा ही हटा दिया । और दूसरी बात, तब और अब भी मुझे किसी जीते जागते इंन्सान को कोई एक आवाज़ देकर बुलाना बड़ा ही अजीब लगता है, सो सबसे पहले मैं एक -दो "स्पॉट" वालों के नाम पूछ लेता हुँ और अगर ख़ुदा न ख़ास्ता कोई ज़रूरत पड़ भी गयी तो उनमें से एक को बुला लेता हुँ और यकीन जानिये उसकी भी आँखों में यह दिखता है कि , "किसी को यहँ मेरा नाम तो पता है", लेकिन इसे मेरी भल्मन्साहत न सम्झें, ना ही कोई बड़्ड़प्पन। मुझे शक है यह उस ही दिन का असर है कि.." देख बच्चू अब दिखाता हुँ, इतनी इज़्ज़त दूँगा कि तू इज़्ज़त ही के मारे छोटा दिखेगा" ।

बड़े होते जब माँ से ज़िद कर, पैसे ऐंठ, बाज़ार में जा ”थंब्स अप” पीता था, तब कहाँ पता कि कोई ऐसी भि दुनिया होगी जहाँ दो टके की नज़र आती ’थंब्स अप’ के बहाने,  औकात पर ही बन आयेगी ।

अब आप मेहरबानी कर यह न कहीयेगा कि शुक्र है उस स्पॉट बॉय का कि उसने मेरा मूड बनाने में मदद की, अपने काम को लेकर हाल इतना भी बुरा नहीं रहा !

हर्ष...